AI से प्रिसिजन कैंसर स्क्रीनिंग: सही लोगों तक, सही समय

फार्मास्यूटिकल और बायोटेक्नोलॉजी में AIBy 3L3C

AI और मल्टीमोडल डेटा से कैंसर स्क्रीनिंग “उम्र-आधारित” से “रिस्क-आधारित” बन रही है। MCED, AI बायोप्सी और व्यावहारिक कदम जानें।

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AI से प्रिसिजन कैंसर स्क्रीनिंग: सही लोगों तक, सही समय

दिसंबर 2025 में हेल्थकेयर की सबसे बड़ी विडंबना ये है: हमारे पास ट्यूमर के मॉलिक्यूलर प्रोफाइल के आधार पर इलाज चुनने की क्षमता है, लेकिन स्क्रीनिंग अभी भी अक्सर “उम्र + फैमिली हिस्ट्री” वाले पुराने फ्रेम पर टिकी रहती है। नतीजा दो तरफा नुकसान है—कई हाई-रिस्क लोग छूट जाते हैं, और कई लो-रिस्क लोग अनावश्यक टेस्ट, चिंता और महंगे फॉलो-अप में फँस जाते हैं।

मैं इसे “प्रिसिजन मेडिसिन का आधा सच” कहता हूँ। इलाज में हम बारीक हुए हैं, पर शुरुआती पहचान में अभी भी औसत पर भरोसा करते हैं। यही जगह है जहाँ AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) फार्मा और बायोटेक की दुनिया में अपनी असली उपयोगिता दिखाती है: अलग-अलग स्रोतों से आए डेटा को जोड़कर किसे, कब, किस टेस्ट से स्क्रीन करना है—यह निर्णय ज्यादा सटीक बनाना।

इस पोस्ट में हम समझेंगे कि प्रिसिजन कैंसर स्क्रीनिंग का मतलब क्या है, मल्टी-कैंसर अर्ली डिटेक्शन (MCED) लिक्विड बायोप्सी, EHR-आधारित “AI बायोप्सी”, और मल्टीमोडल डेटा कैसे स्क्रीनिंग को “वन-साइज़-फिट्स-ऑल” से बाहर निकाल रहे हैं—और फार्मा/बायोटेक टीमों के लिए इसमें अवसर कहाँ हैं।

कैंसर स्क्रीनिंग क्यों “और सटीक” होना जरूरी है?

सीधा उत्तर: क्योंकि स्क्रीनिंग का लक्ष्य सिर्फ कैंसर पकड़ना नहीं, सही लोगों में सही समय पर पकड़ना है। स्क्रीनिंग में गलती दो तरह से नुकसान करती है—

  1. अंडर-डिटेक्शन (छूट जाना): हाई-रिस्क व्यक्ति स्क्रीनिंग के दायरे में आता ही नहीं, या टेस्ट पर्याप्त संवेदनशील नहीं होता।
  2. ओवर-डायग्नोसिस/ओवर-वर्कअप (बेकार पीछा): टेस्ट पॉजिटिव आया, फिर इमेजिंग, बायोप्सी, स्पेशलिस्ट विज़िट—पर अंत में कैंसर नहीं।

उम्र-आधारित नियमों की सीमा

उम्र और फैमिली हिस्ट्री उपयोगी हैं, पर अकेले पर्याप्त नहीं। आज हम जानते हैं कि कैंसर रिस्क में जेनेटिक्स, लाइफस्टाइल, पर्यावरणीय एक्सपोज़र, सह-रोग (comorbidities), हार्मोनल/मेटाबॉलिक संकेत, और कई सामाजिक-सांस्कृतिक कारक भी भूमिका निभाते हैं।

यही कारण है कि प्रिसिजन स्क्रीनिंग का केंद्र “टेस्ट” नहीं, रिस्क स्ट्रेटिफिकेशन है—यानी आबादी को जोखिम के स्तर पर बाँटना और उसी के अनुसार स्क्रीनिंग का तरीका/फ्रीक्वेंसी तय करना।

MCED लिक्विड बायोप्सी: उम्मीद भी, सीमाएँ भी

सीधा उत्तर: MCED टेस्ट एक साथ कई कैंसर पकड़ने की क्षमता दिखाते हैं, लेकिन अकेले इनके भरोसे स्क्रीनिंग रणनीति नहीं बन सकती।

पारंपरिक स्क्रीनिंग अक्सर सिंगल-कैंसर पर केंद्रित रही है—जैसे ब्रेस्ट कैंसर के लिए मैमोग्राफी, सर्वाइकल कैंसर के लिए HPV DNA टेस्ट। इसके मुकाबले MCED (multi-cancer early detection) लिक्विड बायोप्सी खून में मौजूद संकेतों (जैसे ctDNA, methylation patterns आदि) से कई प्रकार के कैंसर के संकेत पकड़ने की कोशिश करती है।

हाल की एक प्रॉस्पेक्टिव MCED स्टडी (PATHFINDER2) के अप्रकाशित परिणामों में 36,000 स्वस्थ प्रतिभागी (उम्र 50+) शामिल थे। इसमें:

  • शुरुआती टेस्ट पॉजिटिव वालों में से लगभग 62% में कैंसर कन्फर्म हुआ (यानी पॉजिटिव आया तो “वास्तविक” होने की संभावना अच्छी)
  • पर कुल कैंसर मामलों में टेस्ट ने केवल 40.4% पकड़े (यानी कई कैंसर छूटे)

यहां संदेश साफ है: MCED “नेट” बड़ा करता है, लेकिन छेद अभी भी बड़े हैं। और जब detection yield कम हो, तो हाई-रिस्क लोगों को पहले से बेहतर पहचानना और भी जरूरी हो जाता है—ताकि लाभ बढ़े और नुकसान घटे।

आक्रामक कैंसर में early detection का मूल्य

PATHFINDER2 में पैंक्रियाटिक एडेनोकार्सिनोमा (PDAC) और ओवेरियन जैसे आक्रामक कैंसर के शुरुआती स्टेज में पकड़ में आने की रिपोर्टिंग खास है, क्योंकि इन कैंसरों में देर से निदान अक्सर परिणाम खराब कर देता है।

पर यहीं “प्रिसिजन” का दूसरा नियम लागू होता है: अगर टेस्ट 100 लोगों में 40 को ही पकड़ता है, तो उन 100 में सही 20-30 चुनना (high-risk) ही असली जीत है। यह चयन AI और मल्टीमोडल डेटा के बिना मुश्किल है।

ओवर-वर्कअप की कीमत: PSA का सबक

सीधा उत्तर: स्क्रीनिंग का फायदा तभी है जब गलत अलार्म (false positives) को नियंत्रित रखा जाए।

प्रोस्टेट कैंसर में PSA स्क्रीनिंग पर दशकों से बहस है—कारण वही: लाभ है, पर अनावश्यक follow-up भी। मौजूदा अनुशंसाओं में 55–69 वर्ष के पुरुषों में PSA स्क्रीनिंग वैकल्पिक है। डेटा के अनुसार:

  • PSA स्क्रीनिंग से प्रोस्टेट कैंसर मृत्यु दर में 13% कमी (no screening की तुलना में)
  • लेकिन PSA टेस्ट में 16% मामलों में PSA बढ़ा हुआ मिला और आगे डायग्नोस्टिक वर्कअप हुआ
  • इन बढ़े PSA मामलों में से केवल 24% में प्रोस्टेट कैंसर कन्फर्म हुआ

यानी काफी लोगों ने खर्च, तनाव और प्रक्रियाओं का बोझ उठाया, पर कैंसर नहीं निकला।

मेरी राय: स्क्रीनिंग कार्यक्रमों को “अधिक टेस्ट” की दिशा में नहीं, अधिक बुद्धिमान चयन की दिशा में जाना चाहिए। यही जगह है जहाँ AI-आधारित रिस्क मॉडल “eligible by age” को “eligible by risk” में बदल सकते हैं।

मल्टीवेरिएबल रिस्क मॉडल: लंग कैंसर से सीख

सीधा उत्तर: लंग कैंसर स्क्रीनिंग में मल्टीवेरिएबल मॉडल उम्र/स्मोकिंग-इतिहास से आगे जाकर ज्यादा सटीक चयन करते हैं—और यही पैटर्न बाकी कैंसरों में भी लागू होगा।

लंग कैंसर स्क्रीनिंग परंपरागत रूप से उम्र और स्मोकिंग इतिहास पर आधारित रही है। पर अब LLPv2 और PLCOm2012 जैसे मल्टीवेरिएबल रिस्क प्रेडिक्टिव मॉडल डेमोग्राफिक और क्लिनिकल वेरिएबल्स को जोड़कर स्क्रीनिंग-योग्यता तय करते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक ये मॉडल पुराने मानदंडों की तुलना में बेहतर detection दे सकते हैं, और कनाडा व UK के राष्ट्रीय कार्यक्रमों में इनका उपयोग बढ़ रहा है।

यह फार्मा/बायोटेक के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?

क्योंकि रिस्क-आधारित स्क्रीनिंग का मतलब है:

  • ट्रायल्स के लिए बेहतर patient enrichment (कम सैंपल में ज्यादा इवेंट)
  • real-world evidence में कम noise, अधिक signal
  • प्रिवेंशन/इंटरवेंशन स्टडीज़ में तेज timelines

यह “फार्मास्यूटिकल और बायोटेक्नोलॉजी में AI” सीरीज़ का वही बिंदु है जहाँ AI सिर्फ एनालिटिक्स नहीं रहता—वह क्लिनिकल निर्णयों की अर्थव्यवस्था बदलता है।

मल्टीमोडल प्रिसिजन स्क्रीनिंग: AI का असली मैदान

सीधा उत्तर: कैंसर रिस्क की सबसे अच्छी भविष्यवाणी एक डेटा-सोर्स से नहीं, कई स्रोतों के संयोजन से होती है—और इन्हें जोड़ने का व्यावहारिक तरीका AI/ML है।

1) ब्रेस्ट कैंसर: WISDOM और MyPEBS जैसी स्टडीज़

व्यक्तिगत स्क्रीनिंग शेड्यूल बनाने का मॉडल अब परीक्षण में है। ब्रेस्ट कैंसर में WISDOM (USA) और MyPEBS (Europe) जैसी स्टडीज़ standard screening बनाम personalized risk-based screening की तुलना करती हैं।

इनमें रिस्क स्कोर अक्सर इन कारकों से बनता है:

  • उम्र
  • फैमिली हिस्ट्री
  • नस्ल/जातीयता
  • ब्रेस्ट डेंसिटी
  • BMI
  • मेनोपॉज़ स्टेटस
  • सैलाइवा-आधारित जेनेटिक टेस्टिंग

व्यावहारिक संदेश: स्क्रीनिंग का कैलेंडर “हर किसी के लिए साल में एक बार” नहीं होना चाहिए। कुछ लोगों के लिए यह बहुत ज्यादा है, कुछ के लिए बहुत कम।

2) “AI बायोप्सी”: EHR से रिस्क प्रेडिक्शन

EHR (इलेक्ट्रॉनिक हेल्थ रिकॉर्ड) के भीतर अक्सर ऐसे संकेत छिपे होते हैं जो अलग-अलग विज़िट पर बिखरे रहते हैं—हल्का-सा वजन घटना, अनियंत्रित ग्लूकोज़, कुछ लैब ट्रेंड्स, रिपीटेड GI शिकायतें, दवा पैटर्न, आदि।

AI-powered extraction और analysis (जिसे कुछ लोग AI biopsy भी कहते हैं) कई बीमारियों—और खासकर PDAC जैसे कठिन कैंसर—के रिस्क का अनुमान लगा सकता है।

पर दो शर्तें निर्णायक हैं:

  • डेटा की गुणवत्ता/घनत्व: EHR अधूरा है तो मॉडल भी अधूरा होगा
  • क्लिनिकल इन्फ्रास्ट्रक्चर: हाई-रिस्क फ्लैग होने के बाद किसको, कैसे, कितनी जल्दी confirmatory workup मिलेगा?

मेरी राय: AI बायोप्सी को “टेस्ट का विकल्प” न समझें। इसे टेस्ट तक सही व्यक्ति पहुँचाने वाला ट्रायएज सिस्टम समझें।

3) एक्सपोसोम, प्री-कैंसर बायोलॉजी और एजिंग सिग्नेचर

उभरता शोध बताता है कि human exposome—यानी जीवनभर के पर्यावरणीय, व्यवहारिक और जीवनशैली एक्सपोज़र्स—कैंसर रिस्क के साथ जटिल रूप से जुड़ा है। इसमें:

  • एयर पॉल्यूशन/PM exposure
  • आहार, नींद, शारीरिक गतिविधि
  • अल्कोहल/तंबाकू
  • पेशेवर (occupational) एक्सपोज़र
  • तनाव और सामाजिक कारक

साथ ही, ब्लड-बेस्ड DNA methylation से ऑर्गन-स्पेसिफिक एजिंग/रिस्क संकेत मिलने की दिशा में भी काम बढ़ रहा है।

यह सब जोड़ने पर तस्वीर बनती है: भविष्य की स्क्रीनिंग “एक टेस्ट” नहीं, रिस्क सिग्नल्स का कंसोर्ट होगी—और उसे पढ़ने के लिए AI चाहिए।

फार्मा और बायोटेक टीमें अभी क्या कर सकती हैं?

सीधा उत्तर: अगर आपका लक्ष्य लीड्स, पार्टनरशिप या प्रोडक्ट-मार्केट फिट है, तो प्रिसिजन स्क्रीनिंग में AI को ‘पायलट-फर्स्ट’ तरीके से अपनाइए।

यहाँ कुछ ठोस कदम हैं जो मैंने कई टीमों के लिए काम करते देखे हैं:

  1. मल्टीमोडल डेटा स्ट्रेटेजी बनाइए

    • EHR + लैब + इमेजिंग रिपोर्ट + जेनेटिक्स (जहाँ संभव) + लाइफस्टाइल/वेयरेबल डेटा
    • डेटा गवर्नेंस, consent, और de-identification शुरुआत में तय करें
  2. रिस्क मॉडल को “क्लिनिकल वर्कफ़्लो” में फिट कीजिए

    • सिर्फ AUC/accuracy नहीं—टाइम-टू-follow-up, referral pathways, और capacity planning भी KPI बनें
  3. हाई-रिस्क कोहोर्ट के लिए “एविडेंस पैकेज” तैयार करें

    • ट्रायल एनरोलमेंट, स्क्रीनिंग uptake, false-positive burden, cost per detected cancer जैसे मेट्रिक्स
  4. बायोमार्कर + AI का संयुक्त वैलिडेशन कीजिए

    • MCED जैसे टेस्ट के साथ EHR risk score जोड़ने पर detection yield कैसे बदलता है—यह व्यावहारिक सवाल है
  5. भारत/दक्षिण एशिया संदर्भ में लोकलाइजेशन करें

    • यहाँ EHR heterogeneity, out-of-pocket खर्च, और फॉलो-अप loss बड़ा मुद्दा है
    • “कम लागत वाले रिस्क ट्रायएज” (AI biopsy) का प्रभाव अक्सर “महंगे टेस्ट” से पहले आता है

स्क्रीनिंग में जीत उस टेस्ट की नहीं होती जो सबसे ज्यादा चीजें पकड़ ले; जीत उस सिस्टम की होती है जो सबसे कम नुकसान के साथ सबसे ज्यादा सही लोगों तक पहुँचे।

आगे की दिशा: प्रिसिजन मेडिसिन का अगला कदम—प्रिसिजन स्क्रीनिंग

कैंसर थैरेपी ने पहले ही दिखा दिया है कि “वन-साइज़-फिट्स-ऑल” अक्सर औसत परिणाम देता है। स्क्रीनिंग में भी वही नियम लागू है। मल्टीमोडल रिस्क पहचान (उम्र से आगे) स्क्रीनिंग को अधिक कुशल बनाती है, ओवर-डायग्नोसिस/ओवर-ट्रीटमेंट का जोखिम घटाती है, और स्वास्थ्य प्रणाली का खर्च सही जगह लगाती है।

“फार्मास्यूटिकल और बायोटेक्नोलॉजी में AI” सीरीज़ के संदर्भ में मैं इसे एक सीधी लाइन में कहूँगा: AI सिर्फ दवाओं की खोज नहीं तेज करता—वह सही मरीज को सही समय पर सिस्टम में लाता है। और ऑन्कोलॉजी में यही सबसे बड़ा bottleneck रहा है।

अगर आपकी टीम AI-आधारित रिस्क स्ट्रेटिफिकेशन, EHR इंटिग्रेशन, या मल्टीमोडल स्क्रीनिंग पायलट पर काम कर रही है, तो अगला सवाल तकनीक नहीं है—आप किस आबादी में, किस क्लिनिकल वर्कफ़्लो के साथ, किस फॉलो-अप क्षमता पर इसे रोल आउट करेंगे?

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